वो एक बर्फ़ीली तूफ़ानी रात थी

वो एक Antarvasna भयंकर डरावनी रात थी. उसके दो कंबल मिलकर भी उस ठंड को रोक नहीं पा रहे थे. उसके बेड के पास पड़ा छोटा हीटर किसी भी चीज़ को गरम करने में असमर्थ था. हीटर का चमकता लाल स्प्रिंग एक आश्वासन मटर था वो भी आसमानी बिजली के यदा – कदा कड़कने पर उसकी तीखी रोशनी के आगे फीका पड़ जाता.

वो अपनी धड़कन को गिन रहा था था के अपना ध्यान गरजते तूफान से हटा सके और अपने विचारों का रुख मौसम की वजह किसी और तरफ मोड़ सके. 20 साल की आयु मैं भी कुदरत का कहर बेचैन कर देने वाला था.

जैसे जैसे रात बीत रही थी, ठंड बढ़ती जा रही थी. जब उसका जिस्म ठंड के मारे काँपने लगा तब उसका ध्यान इस और गया के हीटर की लाल चमक कब की भुज चुकी थी. बिजली चली गयी थी.

वो अपनी टाँगे अपने सीने से लगाए सिकुड़ सा गया. उसने कंबल को अपने बदन के चारों और पूरी तेरह से काश लिया ताकि ठंड अंदर घुसने के लिए जगह ना बचे और वो प्रार्थना करने लगा. रात लगभग आधे से ज्यादा गुजर चुकी थी और तूफान कम होने के कोई असर नज़र नहीं आ रहे थे.

खिड़कियों की खटखटाहट, बादलों के गर्जन और दरवाजों के भाद्बादाने के बीच किसी समय उसने दरवाजा खुलने की चरमराहट सुनी. फिर एक हाथ ने उसे हिलाया और उसने अपनी बचपन की दोस्त कल्पना को कहते सुना “नितिन थोड़ा दूसरी तरफ को खिस्को, मुझे तुम्हारे साथ लेटना है”

बिजली जाने के बाद कल्पना अपने कमरे मैं ना रुक सकी. उसे ठंड और उस शोरशराबे से सख्त नफरत थी. बचपन से उसे आदत थी जब भी कोई इसे तूफानी रात आती तो उसको किसी ना किसी के साथ सोना पड़ता. इससे वो ठंड से बच जाती थी और किसी के साथ होने से उसे कुदरत की भयावहता से भी डर ना लगता.

वो नितिन के कमरे तक काँपते हुए पहुँची थी, हालांकि उसने अपना कंबल ओढ़ा हुआ था. उसके कमरे की खिड़की जिसकी एक चिटकनी पूरी तेरह से बंद नहीं थी, हवा के थपेड़ों से खुल गयी और हवा के साथ साथ बारिश भी उसके बेड तक पहुँच गयी और उसके कंबल को गीला कर दिया. कोई बात नहीं, उसने सोचा, हम गीले कंबल को ऊपर रख लेंगे जिससे वो हमारे जिस्मो को स्पर्श ना कर सके.

नितिन ने जो कंबल ओढ़ा हुआ था, कल्पना ने उसका एक सिरा पकड़ कर उसे खींचा. ठंडी हवा नितिन से सीमेंट की स्लॅब की तेरह टकराई. वो जल्दी से नितिन के कंबल मैं घुस गयी और अपना कंबल उसके कंबल के ऊपर फैला दिया और उसे अपने बदन के नीचे दबाकर पूरी तेरह सीलबंद कर दिया. उसके दाँत कीटकिटा रहे थे और वो धीमे से बड़बड़ाई, “मुझे लगता है भगवान आज वाकई बहुत क्रोधित हैं!”

वो अपने जिस्मो की साइड से साइड जोड़े लेते हुए थे. उसका हाथ उसके कंबल को उसकी तरफ से दबाकर ठंडी हवा के प्रहार को रोकने की कोशिश कर रहा था. कल्पना अपनी तरफ से कंबल दबाकर बदन मैं कुछ गर्मी लाने का जुगाड़ कर रही थी. वो अपने मुख से अपने हाथों पे गरम फूँके मर रही थी और फिर उसने उन्हें मज़बूती से बाँध दिया और फिर उन्हें अपनी जांघों के बीच लेजा कर काश लिया जैसे हम अक्सर अपने ठंडे हाथों को गरम करने के समय करते हैं. उसने अपना हाथ अपनी कल्पना के सर के नीचे से ले जाकर उसकी तरफ से भी कंबल सील करने का प्रयत्न किया. कल्पना ने उसकी तरफ करवट ली और उसके कंधे पर सर रखकर उससे सात गयी. उसका घुटना उसकी तंग के नीचे था और डाय तंग के ऊपर.

उस आरामदायक मुद्रा मैं, जो भी थोड़ी बहुत शारीरिक गर्मी उनके अंदर बची थी और उसके साथ साथ दो कंबलों को ओढ़ने से उन्हें ठंड का प्रभाव कम होता नज़र आने लगा. जैसे जैसे उनकी हालत सुधारने लगी और उन्हें अच्छा लगने लगा तो वो और भी काश कर चिपट गये ताकि ज्यादा से ज्यादा गरमाहट का एहसास ले सकें.

गरमाहट के साथ साथ, उसकी कल्पना के जिस्म की अद्भुत कोमलता भी नितिन को बहुत सुखदायी महसूस हो रही थे—जैसे ममतामयी सुखदायी होती है. कल्पना भी अपने नितिन के साथ बहुत सुरक्षित और राहत महसूस कर रही थी. जब उन्हें सर्दी लगनी बंद हो गयी तो बहुत जल्द दोनों नींद के आगोश मैं चले गये.

रात के किसी समय बिजली वापस आ गयी थी. अगली सुबह नितिन का शरीर जागने से पहले उसका मान जगह उठा जो रात के कहर के कारण बुरी तेरह तक हुआ था. वो बेड पे , आंखें बंद किए, टाँगे फैलाए कंबल से और गरमाहट पाने के मकसद से चुपचाप लेटा रहा. ज्यादातर उसकी सुबह हमेशा खूबसूरत होती थी क्योंकि रात को देखे एक दो सपनों की.वजह से सुबह उसका लंड हमेशा अकड़ा होता. कभी कभी वो उसे अपने आंडरवेयर के ऊपर से थाम लेता और कॉटन के मुलायम कपड़े से अपनी उंगलियों और अपनी हथेली की नर्माहट का आनंद लेता.

आज उसके हाथ कुछ ज्यादा ही कोमल और मुलायम महसूस हो रहे थे. अपना जिस्म टांट हुए उसने अपना लंड और ज्यादा अपनी हथेलियों मैं धकेला ताकि उसे ज्यादा से ज्यादा अपने हाथों की कोमलता मैं छुपा सके तभी उसकी आंखें झटके से खुल गयी. उस झटके से वो बरफ की तरफ सुन्न पड़ गया जब उसे एहसास हुआ के वो अपना लंड अपनी कल्पना के नितंबों के बीच दबा रहा है. पिछली रात की यादें उसके दिमाग मैं ताजा हो उठी. उसे याद हो आया क्यों उसकी कल्पना उसके बेड पर उसके साथ मौजूद थी ताकि वो दोनों साथ लेटकर कुछ गरमाहट हासिल कर सके और उस बर्फीली ठंडी रात को काट सके. मगर अब जब उसकी जगह खुली थी तो उसका लंड अपनी कल्पना के नितंबों के बीच फँसा हुआ था. देखने से लग रहा था वो अभी भी गहरी नींद मैं है.

उसने यथासंभव खुद को स्थिर बनाए रखा, उसे डर था किसी भी हिलमिल से उसकी नींद टूट जाएगी और वो जान जाएगी के उसके लेडल का लंड उसकी गांड मैं घुसा पड़ा है. मगर खुद को स्थिर बनाए रखना उसकी बड़ी भूल साबित हुआ क्योंकि उसके नितंबों के कोमल और मुलायम एहसास से उसका लंड और कड़ा हो गया था. उसका 22बर्षीय लंड पत्थर के समान कड़ा था और उसके नितंबों की घाटी मैं फँसा हुआ था और अब उसने झटके मरने शुरू कर दिए थे क्योंकि पूरे जिस्म का लहू मानो उसके लंड पर दबाव डाल रहा था. धीरे धीरे वो अपना लंड उसकी गांड से बाहर को खींच कर निकालने लगा. अपने लंड पर उसकी कोमल गांड का स्पर्श कितना सुखद और कितना जबरदस्त महसूस हो रहा था मगर अपनी ही कल्पना के जिस्म पर अपना लंड रगड़ने के गुनाह से वो व्याकुल हो उठा था.

आख़िरकार कुछ समय बाद, उसका लंड उसकी दरार से बाहर था. वो करवट लेकर पीठ के बाल हो गया. वो शुक्र मना रहा था के वो जागी नहीं थी और उसे मालूम नहीं चला था के क्या हो रहा था. वो अभी भी स्थिर होकर लेता हुआ था और अपने मान के उन एहसास की मीठी यादों को दबाने का प्रयत्न कर रहा था जब उसके नरम मुलायम कूल्हे उसके लंड को लीले हुए थे और साथ साथ ही जो कुछ घटा था उस पर उसको पछतावा भी महसूस हो रहा था.

आसमान से रात भर जम कर बारिश हुई थी और अब मुस्कराता हुआ सूर्य बादलों के बीच से कभी कभी झाँक रहा था. दिन मैं कुछ गरमाहट का एहसास होने लगा जब सूर्य की तपिश ने सीमेंट की दीवारों और फर्श को थोड़ा गरम कर दिया.

नितिन के उसकी गांड की दरार से अपना लंड निकल लेने के थोड़ी देर बाद ही तुनकती हुई कल्पना उठ जाती है और जमहाइयाँ लेने लगती है. वो बेड से उठ कर घर मैं घूमने लगती है इस बात से पूरी तेरह बेख़बर के उसके साथ क्या घटा था. हालांकि पीठ मैं नीचे हल्का सा दबाव उसे उलझन मैं डाले हुए था, मगर वो रात की थकान के बाद अभी भी पूरे होश मैं नहीं थी इसलिए उसने इस और कोई विशेष ध्यान नहीं दिया.

इस बार उसके लंड ने अपनी कल्पना के नितंबों की दरार के एकदम बीच मैं दस्तक दी और सोने पे सुहागा यह के एकदम वहाँ उसका लंड गया था जहाँ उसके नितंब पूरे भरे हुए थे और दरार एकदम गहरी थी. उसने अपनी साँस को नियंत्रित करने की कोशिश की जबकि उसका लंड उसके नितंबों को छू रहा था. मगर वो हलका सा स्पर्श भी काफी था नितिन की धड़कने बढ़ा देने के लिए, उसकी रगों मैं दौड़ते हुए खून की रफ्तार को दुगुना कर देने के लिए. वो कान लगाकर उसकी साँस की आवाज़ सुनता रहा ताकि देख सके अगर उसने उसे जगा तो नहीं दिया है. जाहिर था नहीं. कल्पना अभी भी गहरी नींद मैं सोई हुई थी.

एक लंबे अंतराल तक वहाँ रुकने के बाद उसने थोड़ी हिम्मत की और धीरे से उसे थोड़ा सा अंदर धकेला. उसके नितंब दबाव की वजह से फैल गये और उसका सूपड़ा गरमाहट से भरपूर उसके कोमल नितंबों की दरार मैं घुस गया. अभी भी उसकी नींद मैं कोई विघ्न नहीं आया था. उसका लंड पत्थर के समान कठोर था और बुरी तेरह से तड़प रहा था. उसके जिस्म का सारा खून उसके लंड पर केंद्रित था. उसकी विचार कशमता उस जबरदस्त एहसास से कुछ उलघ गयी और उसने अपना लंड और आगे ठेलने का फैसला किया.

उसका लंड नितंबों की दरार को फैलता हुआ अंदर घुसता चला गया. उसका लंड काफी लंबा और मोटा था और उसने उसके नतंबो को काफी हद तक फैला दिया था. कल्पना इस अग्यात आक्रमण पर नींद मैं कुन्मुना उठी. नितिन बुरी तेरह से घबरा गया. उसे समझ नहीं आया अगर उसे एकदम से अपना लंड बाहर खींच लेना चाहिए था जा क्या करना चाहिए था. वो जगह रही थी. उसका लंड उसकी गांड मैं फँसा हुआ था. वो बहुत बड़ी उलझन मैं था.

कल्पना अपनी पीठ मैं किसी चीज़ के दबाव की सनसनाहट से जगह उठी. उसे मालूम नहीं चला के क्या हो रहा था क्योंकि वो अभी भी आधी नींद मैं थी मगर उसे यह एहसास होने मैं ज्यादा वक्त नहीं लगा के उसके नितंबों के बीच कुछ गुशा हुआ है. मोटाई और आकर से जाहिर था के वो लिंग था और क्योंकि वो नितिन के साथ बेड पर सोई हुई थी, यह उसी का लिंग होना चाहिए था. नितिन का लिंग उसके नितंबों की दरार मैं घुसा हुआ था; इस बात के एहसास से वो एकदम परेशान हो उठी. उसके नितिन का लिंग उसकी गांड मैं था, उसे यकीन नहीं हो रहा था.

तनाव से उसका बदन कुछ काश गया था, जिस कारण उसके नितंब आपस मैं भींच गये और नितंबों के साथ-साथ उनमें घुसा हुआ उसके नितिन का लंड भी भींचता चला गया. वो अपने स्थान पर जड़वत् हो गयी; उसे समझ नहीं आ रहा था के वो क्या करे. उसे विश्वास था वो ऐसा जानबूझ नहीं कर रहा था, आख़िरकार वो उसका नितिन था. यह असंभव था के कोई नितिन अपनी कल्पना की गांड मैं अपना लंड चुबोय. जरूर यह संयोगवश हुआ था क्योंकि वो बहुत गहरी नींद मैं प्रतीत हो रहा था. मगर अब समस्या यह थी के उसका लंड इस हद तक उसके नितंबों की दरार मैं फँसा पड़ा था के अगर वो अपनी कमर हिलाकर उसे बाहर निकलती तो उसका नितिन जगह सकता था. वो उसे जगाना नहीं चाहती थी. वो नहीं चाहती थी के उसका नितिन जागे और अपनी कल्पना की गांड अपने लंड पर महसूस करे. इस हालत मैं जागने पर वो क्या सोचता?

जहाँ एक तरफ नितिन बहुत शर्मिंदा और व्याकुल था वहीं वो उस उत्तेजना को भी झुठला नहीं सकता था जो उसे उस एहसास के याद आने से होती थी जब उसका लंड अपनी कल्पना के नितंबों के बीच फँसा हुआ था. कपड़े के ऊपर से भी उसकी गांड कितनी कोमल, कितनी नरम कितनी मुलायम महसूस हो रही थी, कैसा जबरदस्त एहसास था जब उसका लंड अपनी कल्पना के नितंबों की गरमाहट ले रहा था. गुनाह और सुंदर एहसास, शर्म और मादकता, और जो स्ंक्षेप मैं कुछ भी हो सकता था स्वर्ग जा नरक- की विपरीत मनःस्थिति की बयानो मैं वो उलझा हुआ था. कम से कम वो इतना तो शुक्र मना ही सकता था के उसकी कल्पना इन सब बातों से अंजान थी. वो अपने मान मैं चल रहे मर्मांतक को खुद ही झेल रहा था.

अगली रात कल्पना ने सावधानी और सुरक्षा बरतते हुए पहले ही नितिन के साथ लेटने का फैसला किया इससे पहले के ठंड से मजबूर होकर उसे यह कदम उठना पड़ता. समझदारी इसी बात मैं थी के भयंकर सर्दी और मूसलाधार बारिश से बचने की तैयारी पहले से ही कर ली जाए. दो कंबल, बेड के दोनों तरफ दो हीटर और दो बदन कुदरत के आतंक से बचने के लिए सुरक्षा प्रदान करने वाले थे.

कल्पना गहरी नींद मैं थी जबकि उसका लंड पूरा कठोर था. पिछली रात वो नींद मैं उसकी पीठ से चिपक गया था और उसका लंड उसके नितंबों की दरार मैं घुस गया था. इस रात वो उसकी दरार से बाहर था. वो आज भी पिछली रात की तेरह नींद मैं उसकी पीठ से सात सकता हां और जागने पर उसी मीठी सनसनी का आनंद ले सकता था,मगर वो ऐसा नहीं कर पाया था. वो कर सकता था माँग उसने किया नहीं.

वो विचार उसके दिमाग मैं उतनी ही तेजी से आया जितनी तेजी से आसमानी बिजली धरती की और झपट रही थी. वो अभी भी…..अभी भी…..करवट ले सकता था…..उसकी पीठ से साथ सकता था…..और जागने पर अपनी कल्पना के नितंबों के बीच घुसे अपने लंड का अनोखा मजा ले सकता हां.

वो गहरी नींद मैं थी और वो पूरी तेरह से जगा हुआ था. वो अपनी आंखें बंद किए लेटा रहा, गहरी और नियंत्रित साँस लेता रहा और फिर उसने उसके पीछे की और करवट ले ली ताकि उस पतित आनंद का मजा ले सके. वो अपनी गंदी सोच के लिए खुद को लानत दे रहा था बल्कि खुद पर शर्मिंदा भी था; मगर फिर भी वो आगे बढ़ा और खुद को अपनी कल्पना की पीठ के साथ सटा कर व्यवस्थित किया.

उसने अपने हाथ से अपना लंड थाम उसका रुख सीधा सामने की और किया और इसके बाद उसने धीरे धीरे अपनी कमर एक एक इंच आगे सरकाना शुरू कर दी. उसे लगा जैसे वो अनंतकाल से कोशिश कर रहा है मगर आख़िरकार लंड का अग्रभाग उसकी गांड से स्पर्शित हुआ. मगर वो उसके नितंबों की दरार से दूर उसके दाएँ नितंब के एकदम बीच मैं सटा था. जिस तेरह वो आगे बढ़ा था उसी तेरह से फिर से वापस पीछे हटने आगा, उसने खुद को फिर से व्यवस्थित किया और फिर से आगे बढ़ने के यतनामयी सफ़र की शुरूआत की.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *