Antavasna Hindi Sex Stories मकड़जाल 9

अजीत~: ये मुझे नहीं पता…पर ये देव ठाकुर नहीं है…पक्का कह सकता हूँ.इसका खुद की कोई निजी वजह होगी.
प्रिया~: नहीं मिस्टर. अजीत….इसकी कोई निजी दुश्मनी नज़र नहीं आती…मैंने जितनी तहक़ीकात की है….एक ही बात खुलकर सामने आईहाई की इस देव का ठाकुर परिवार से गहरा रिश्ता है….इससे जुड़ी हर बात इसी केस की तरफ इशारा करती है…..एक बात बताओ…?
अजीत~: क्या ?
प्रिया~: आप किसी इंस्पेक्टर. मनिराम को जानते है..?
अजीत~: जी हाँ…यही इंस्पेक्टर. था जब ये हादसा हुआ था…बड़ा भ्रष्ट पुलिसवाला था…एक मोटी रकम ली थी इसने मुक्ति रेप केस को दबाने में…
प्रिया~: ये खुद आजकल पुलिस हिरासत में है…?
अजीत~: क्यों ?
प्रिया~: इसे देव ने ही बर्खास्त करवाया है और कानून के लपेटे में फँसाया है…!
अजीत~: क्या…
“हाँ….प्रिया ने सारी बात डीटेल्स के साथ बताई.
प्रिया~: क्या अब भी तुम यही कहोगे की इस देव की कोई पर्सनल दुश्मनी है..?
अजीत~: कुच्छ समझ में नहीं आ रहा है….आख़िर माज़रा क्या है….मेरा दिमाग घूम रहा है..
प्रिया~: किसी की समझ में नहीं आ रहा है….शायद ये जो भी है….ठाकुर परिवार के सारे राज़ फर्श होने पर ही सच सामने आएगा….ठाकुर केस की हर डीटेल्स खुलने के बाद ही पता चल पाएगा की आख़िर है कौन और सारा रायता क्यों फैला रहा है…सब कुच्छ जाने के लिए मुझे आपकी मदद चाहिए ?
अजीत~: मैं आपके साथ हूँ…बताइए मैं क्या कर सकता हूँ…?
प्रिया~: कुच्छ सवालों के जवाब चाहिए?
अजीत~: पूछिए…क्या पूछना है,,?
प्रिया~: देव ठाकुर कही बाहर पढ़ता था…मैं सुना है वो लॉ का स्टूडेंट था…?
अजीत~: सच है…देव एक ज़हीन दिमाग का मलिक था…इसीलिए ठाकुर परिवार उसे वकील बनाना चाहता था.
प्रिया~: क्या बता सकते हो..वो कोन से कालेज में पढ़ता था…?
अजीत~: ये तो नहीं पता…पर इतना पता है की वो यही मुंबई में ही पढ़ता था.
प्रिया~: क्या….?
अजीत ~: हाँ…!
प्रिया~: आपको कैसे पता….?
अजीत~: जब मुक्ति की मौत हुई तब देव आया था…..ठाकुर अंकल बार बार उसे मुंबई लौट जाने को कह रहे थे…
प्रिया~: आपकी कोई बात नहीं हुई…?
अजीत~: नहीं….उस वक्त पूरा परिवार गुम में डूबा था….मैं सिर्फ़ एक दिन रुका था…अगले दिन लौट आया….आते वक्त मैंने अपना कार्ड दिया था.
प्रिया~: देव कभी आया…?
अजीत~: नहीं…ना ही वो आया और ना ही उसकी कोई खबर मिली.
प्रिया~: उसकी कोई फोटो…कोई और बात..?
अजीत~: नहीं है…!
प्रिया~: कोई बात नहीं….उसका हुलिया ही बता दीजिए…!
अजीत ने जो हुलिया बताया…वो हज़ारों लोगों से मिलता जुलता था….!
प्रिया ने अजीत से ढेर सारे सवाल किए….अजीत सबके जवाब.देता रहा…..
देव की पहचान तो उजागर नहीं हुई पर ठाकुर केस के काफी सारे पहलू उजागर हो गये…..प्रिया वहाँ से विदा लेकर अपने ऑफिस पहुँची.
प्रिया ने सारी कहानी अब तक मिले सबूतों के आधार पर तैयार करके च्चपने का फैसला किया…उसने मुंबई….दिल्ली और रेवड़ी के अख़बार में एक साथ च्चपने का निश्चय किया…दिल्ली और रेवड़ी में भी ताजा खबर का ऑफिस था…सबको एक एक कॉपी भिजवा दी…एक एक कॉपी हर न्यूज चॅनेल को……!
अगली सुबह धमाके की सुबह थी….अब ठाकुर केस फाइल फिर रीयोपन होने वाली थी…प्रिया की उम्मीद से भी बड़ा धमाका होने वाला था….
सब धुरंधारो को क्या पता था की कोई उनसे सारा काम करवा रहा है…ये सारे किरदार तो बेचारे सोच रहे थे की वो सब कर रहे है….पर क्या यही सच था….या कोई मकड़जाल ???????
आज दिल्ली की सुहानी रात थी….शाम को हल्की हल्की हुई बारिश ने मौसम को खुशनुमा बना दिया था….रोशनी से नहाया शहर…और भीनी भीनी खुशबू भीखेरती हंडी हवा के झोंके आज की रात को यादगार बना रहे थे…
रात के अभी सिर्फ़ 8 बजे थे….देव अपने रूम पर लौटा….दरवाजे पर लगा लॉक खोला और अंदर घुसा तभी एक मर्दाना आवाज़ गूँज उठी…” वेलकम…देव प्यारे…वेलकम !
देव चौंका…घर बंद था….फिर ये अंदर कैसे घुसा..कौन है ये…इस तरह कैसे आया….घुसा भी तो किधर से….कई सवालों से देव घिर आया….जल्द ही खुद पर काबू पाया और बोला~: थेन्कस मिस्टर…
“बॉन्ड….कहते है मुझे…आज़माबी बोला और अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.
देव ने हाथ मिलते हुए कहा~: बॉन्ड….?
बॉन्ड~: जी…बॉन्ड…इंडियन बॉन्ड…प्यार से लोग मुझे दीपक बॉन्ड कहते है….!
देव~: देव ठाकुर…प्यार से लोग देव ठाकुर ही कहते है.
दोनों धुरंधारो के चेहरे पर मुस्कान नाच रही थी.
देव~: आहो…भाग्य हमारे…जो बॉन्ड साहेब इस गरीब के घर पधारे…..बैठिए.
दोनों पास ही पड़ी कुर्सियो पर बैठ गये.
देव~: बॉन्ड सर…को तक़लीफ़ क्यों उतनी पड़ी…नाचीज़ को याद करते ..हाज़िर हो जाता…!
बॉन्ड मुस्कराया….समझ गया की लड़का पक्का खिलाड़ी है…..इससे कुच्छ उगलवाने में पसीना आएगा.
कहने को तो देव भी मुस्करा रहा था…पर अंदर ही अंदर कोई बात उसे परेशान कर रही थी…पर देव ने चेहरे से जाहिर नहीं होने दिया….बॉन्ड जैसा शातिर जब तक ताड़ पता..देव खुद पर काबू पा चुका था.
देव~: तो बॉन्ड साहेब..हमें आपका मिलने का तरीका पसंद आया…!
बॉन्ड~: पर हमें आपकी एक बात पसंद नहीं आई..प्यारे…!
देव~: वो क्या??
बॉन्ड~: भाई..सीधी सी बात है…हम बॉन्ड है तो खुद को बॉन्ड ही कहेंगे..मगर….?
देव~: मगर…?
बॉन्ड~: आप खुद को देव ठाकुर क्यों कह रहे है…हमारी समझ में नहीं आ रहा है…प्लीज़ समझाए हमें..प्लीज़.
बॉन्ड ने सचमुच हाथ जोड़ दिए.
देव चौकना हो गया…देव ने बॉन्ड को पहली नज़र में काफी हद तक पहचान लिया था पर इतना शातिर है समझ नहीं पाया था…पर उसकी बताओ ने साफ दर्शा दिया की उसको कुच्छ कहना..सोच समझ कर कहना…देव ने खुद पर काबू रखा.
देव~: फिर आप ही बता दीजिए ना की अगर मैं देव ठाकुर नहीं तो फिर कौन हूँ ?
देव के इस तरह खुले छल्लंगे से बॉन्ड भी हिल गया….वो समझ गया जितना उसने सोचा है लड़का उससे कई कदम आगे है.
देव~: आप मज़ाक अच्छा करते है..मुझे पसंद आया.
बॉन्ड~: कभी कभी हल्का फुलका छोड देते है प्यारे…..!
देव~: वैसे मिस्टर.बॉन्ड…आप करते क्या है….?
बॉन्ड~: समाज सेवा…!
देव~: वो कैसे…?
बॉन्ड~: च्चिपे हुए रहस्य को उजागर करना….लोग जिन्हें चमत्कार कहते है…उन चमत्कारो की पॉल खोलना समाज सेवा ही तो है प्यारे….सही कह रहा हूँ ना…?
“जी….देव इतना ही कह पाया…पर बॉन्ड के जवाब ने उसका सारा परिचय खुद भी खुद दे दिया…देव सतर्क हो गया.
देव~:यहाँ किस चमत्कार की पॉल खोलने आए है…महोदय ?
बॉन्ड~: कई साल पहले गायब हुआ साक्ष् एक नये चेहरे के साथ प्रकट होता है…खुद को वो जो बताता है….असल में वो है नहीं….क्या ये चमत्कार से कम है….अब जहाँ चमत्कार है …वहाँ हम है यानि..बॉन्ड ..दीपक बॉन्ड…!
इतना कहकर बॉन्ड ने अपनी गहरी नज़रे देव पर जमा दी…पर मजाल थी की देव के चेहरे पर कोई लकीर भी उभर जाए….देव बस मुस्कुराता रहा.
देव~: अच्छा काम है ..करते रहिए.
बॉन्ड~: पर कितने अफ़सोस की बात है की ऐसी अच्छे काम में भी लोग अपना सहयोग नहीं करते है….

बॉन्ड~; पर आप तो ऐसे नहीं है…है ना मिस्टर. गुमनाम ?
देव~: गुमनाम…?
बॉन्ड~: जी…जब आप देव है ही नहीं..जो की खुद को बताते है..फिर तो गुमनाम ही हुए ना..?
देव~: अगर ऐसा है तो साबित कीजिए..
देव ने सीधा छल्लंगे किया.
बॉन्ड~: आवास्या करेंगे भक्ता….बॉन्ड बाबा के दरबार से कोई निराश नहीं जाता….पहले रूम का पंखा और खिड़कियां बंद कीजिए….फिर करेंगे.
देव बॉन्ड की अजीब डीमाड से चकरा गया….देव अगर चाहता तो बॉन्ड के किसी भी सवाल देने से मना कर सकता था…पर बॉन्ड की बातों से समझ गया की ये आदमी सारा होमवर्क करके आया है….ये भी उसी केस की पड़ताल में जूता है जिस पर कई धुरंधर काम कर रहे है….बस सवाल एक समझना बाकी था की बॉन्ड किस डिपार्टमेंट है और कितना पहुँचा हुआ खिलाड़ी है…देव बस यही जाने के लिए बॉन्ड के सवालों का जवाब दे रहा था…
देव~: भला वो क्यों..
बॉन्ड~: क्या है ना प्यारे…मुझे अजीब सी बीमारी है….कभी कभी गर्मी के मौसम में भी ठंड लगने लगती है…जैसे की आज….बस थोड़ी देर में ठीक हो जाएगी….तब तक ज़रा मेहमान का कहना मानो…!
देव की समझ में सचमुच कुछ नहीं आया…सारी खिड़कियां और फन वगैरह बंद कर फिर अपनी जगह आ बैठा.
बॉन्ड~: एक बात तो माननी ही पड़ेगी…अच्छे मेजबान हो प्यारे.
देव~: थेन्कस मिस्टर. बॉन्ड.
बॉन्ड~: अब शुरू करते है…मॅजिक शो….आप अगर देव है तो अपनी आइडी दिखाए.
देव ने अपना ड्रॉयिंग लाइसेन्स दिखाया…
बॉन्ड गौर से ड्रॉयिंग लाइसेन्स देखता रहा.
देव~: असली ही है ना…?
बॉन्ड~: शुक्र है …आप की तरह आपका लीएसेंसे तो नहीं निकला.
देव~:वो कैसे…?
बॉन्ड~:सब बताएँगे प्यारे…ज़रा साँस तो लेने दो…?
रूम में उमस सी हो गयी….माथे पर पसीने की बूंदें झलक उठी….देव के माथे पर भी पसीना चालक आया.
बॉन्ड~: अब हम ठीक है प्यारे…फन चालू कर सकते हो…खिड़कियां खोल सकते हो…
देव~: अगर आपको फिर ठंड लगने लगी तो…?
बॉन्ड~: नहीं मेरे भोले बालम….हमें ये बीमारी दिन एक ही बार होती है….और आज की हो चुकी है…!
देव~: बड़ी अजीब बीमारी है….
बॉन्ड~: अब क्या करे प्यारे…है तो है.
देव ने फिर उमस से निजात पाने में लग गया…फिर वापस आकर बैठ गया.
बॉन्ड~: आप इसे जानते है….?
बॉन्ड ने एक तस्वीर पटकी….
देव~: जी..नहीं…!
बॉन्ड~: कमाल है…आप अपने पदोषी तक को नहीं जानते….!
देव~: होगा….कोई जरूरी तो नहीं की मैं सब पदोषियो को जनता हूँ ?
बॉन्ड~: कोई जरूरी नहीं प्यारे…पर ये महोदय आपको अच्छे से जानते है…इनका कहना है की ये आपसे कई बार मिल चुके है…
देव~: हो सकता है….मुझे याद नहीं.
बॉन्ड~: चलो कोई बात नहीं….पर इनका कहना है की जब आप अपने नये घर में शिफ्ट हुए थे तबसे लगातार ,लगभग राज मुलाकात होती थी….?
देव~: मगर मैं तो नये घर में कभी रहा ही नहीं…!
बॉन्ड~: फिर कहाँ रहे..?
देव~: अपने हॉस्टल में…
बॉन्ड~: कौनसा हॉस्टल..?
देव~:इतना कुच्छ बताया है …कुच्छ तो खुद पता कीजिए…आख़िर बॉन्ड है आप…दीपक बॉन्ड.
दोनों एक साथ मुस्करा उठे.
बॉन्ड~: वो भी पता कर लेंगे प्यारे…?
देव~: करना भी चाहिए…आख़िर बॉन्ड जो है आप.

बॉन्ड~: प्रो. सैनी को जानते है आप ?
देव~: कौन प्रो. सैनी…?
बॉन्ड~: वही ,,,जहाँ आपके अंकल पढ़ते थे…जहाँ आपकी बहन पढ़ती थी…जहाँ से आपके परिवार को मुसीबतो का सामना करना पड़ा था… कुच्छ याद आया…?

देव~: श…अंकल सैनी…माफ कीजिएगा…ज़रा भूल गया था.
बॉन्ड~: ज़रा पहचान कर बताइए की इनमें से कौन है मिस्टर. सैनी….?
बॉन्ड ने कई फोटोस देव के सामने डाली.
देव ने सब फोटो को गौर से देखा और एक तस्वीर पर अंगुली रख दी.

“वो मारा पापड़ वाले…बॉन्ड खुश होकर उछाला….

एव समझ नहीं पाया की बॉन्ड अचानक इतना खुश क्यों है….!
देव क्या जनता था की बॉन्ड कितना शातिर है…अगर देव अपने खेल का मास्टर था तो बॉन्ड अपने खेल का मास्टर….

आख़िर बॉन्ड इतना खुश क्यों हुआ….बॉन्ड और देव की बातें क्या गुल खिलाने वाली थी…आख़िर क्या चल रहा था ये….??????
देव की हैरत कुच्छ ज्यादा ही तरफ गयी…जब बॉन्ड को किसी बच्चे की तरह नाचते..उछलते देखा…..बड़ा अजीब है ये साक्ष्…देव सोच रहा था……!
बॉन्ड~: थेन्कस देव प्यारे….एक बहुत बड़ा राज़ फर्श कर दिया है तुमने.
देव~: क्या…कैसा राज़ ?
बॉन्ड~: बताऊंगा प्यारे…सब बताऊंगा…थोड़ा सब्र तो करो….
देव चुप रहा.

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